Thursday, 23 February 2017
वा रे जिंदगी
अच्छा खासा सो रहा था पता नहीं कहाँ से एक ब़डा ही विचित्र सपना प्रत्यक्ष आ
खडा हुआ है ,भयभीत हो उठा हूँ,मन बेचैन सा हो गया है । आज सपने में दादी से जीने
की वजह पूछ डाली,जो कतेही नहीं पूछनी चाहीए थी। दादी के पास इस प्रश्न का उत्तर
बना बनाया प़डा था,बस इंतजार था तो मेरे
जैसे किसी जिघासा पूर्ण व्यक्ति के पूछने का, उत्तर था मरने के लिए ।एक बार के लिए
तो लगा दादी ऐसे ही हँसी दिल लगी कर रही
है मुझसे ,पर नहीँ ,मुख्य बात यह थी कि वह बोली में लाख कोशिश करने के बावजूद उसमें
छिपी उस मार्मिकता को छिपाने मे असक्षम रही जिसे जानने के लिए मैं बडा व्याकुल था।
दादी 80 साल की है,जिंदगी की बडी अच्छी समझ लिए थी। फिर मैने दादी को विस्तार से
समझाने को कहा ,मेरी यह जानने की तीव्र इच्छा थी कि दादी ने अपनी जिने की वजह मरना
है इसलिए क्यों कहा ।
व्यक्ति जन्म लेता है,तो मैं बीच में जट से बोल पडा. हां वो तो मैने भी
लिया है। दादी मुझे फटकार कर आगे बडी, व्यक्ति जिंदगी के हर पडाव पर एक लक्ष्य निधार्रित करता है,उसे
पाने के लिए वह काम करता है,काम करता है तो उसका समय कटता है,इसलिए बिना लक्ष्य
बाधें समय काटना मेरी समझ के बाहर है।और यहीं से शुरू होती होती है जिंदगी की स्पर्धा ,समय के साथ साथ रुचियाँ
बदलती है, नये नये लक्ष्य जुडते चले जाते
है , और जो व्यक्ति यह करने में नाकाम रहता है,वह आत्मदाह कर लेता है,कयोँ कि वह
जिंदगी जीने की वजह ढुढने मे नाकाम रहता है। इसी दौरान ससांरिक कष्ट,वेदना
,शारीरिक पीडा जैसी विपदाएं भी समक्ष आ खडी होती चली जाती है,लेकिन इन सब से ऊपर उठकर जो जिना सिख लेता है
,वही सही मान्य़ में जीवन के रस पाने योग्य है,इसे ही जिना कहते है । जिंदगी की वास्तविकता बताने के दौरान दादी ने बडी ही अनोखी विचारधारा मेरे प्रत्यक्ष
ला पटकी। व्यक्ति जिस सुख के पीछे भागता है दरअसल वह दुख के अभाव के बिना संभव
नहीं।स्थायी जिंदगी नहीं जी जा सकती। दुख के आभास के बिना सुख का आभास नहीं किया
जा सकता । दुख है तो उससे निकलने की एक वजह जिंदगी जिने की वजह बन जाती है और
इसलिए खुदा ने दुख-सुख दोनो को साथ संजोया है। मिठा फल कडवे फल से अच्छा लगता है
पर क्यों,क्यों कि वह कडवा नहीं है।बिना कडवे की पहचान के बिना फल मीठा कैसे हो
सकता है।दादी के इस उदाहरण ने मुझे बडी सहजता से दुख-सुख दोनो की आवश्यकता का बोध करा दिया। किंतु अभी भी मैं किसी निष्कर्ष
पर नहीं पहुँच पाया और नहीं जान पाया कि दादी ने अपने जीने की वजह मरना है क्यों
बताया। य़ह सब जानने के बाद मेरी व्याकुलता
और तीव्र हो उठी,और दादी के प्रत्यक्ष यही सवाल ला पटका।
दादी स्तब्ध रह गई मानों वह उस सवाल का जवाब अपने अंदर ही रखना चाहती
थी।उसकी आवाज. कपकपाने लगी,मार्मिकता का स्थर भी ऊपर उठ गया। अपनी दादी की आवाज.
में एक डर साफ दिखाई पड रहा था मुझे। हिम्मत
करके वह बोल पडी,क्यों की मेरे पास अब कोई लक्ष्य नहीं है निश्चय करने को।य़ह कहके
दादी रो पडी,मैं सब कुछ समझ गया कि आखिर कार दादी के अंतर मन में चल क्या रहा
है।वह अंदर ही अंदर गुट रही थी।शरीर से तो टुट ही गई वो पर अब शायद वह अपनी
मानसिकता को उस और ले जा रही थी जिसका मुझे बचपन से डर लगता है। दादी रोते रोते
बोली ‘’अब मुझे जाना है,यही मेरा लक्ष्य है’’।अपनों से बिछडने का डर उसकी आँखो और बातों में साफ झलक रहा था।दादी के यह शब्द
मुझे अंदर से काट रहे थे जैसे-‘’चली जाऊँगी एक दिन बिना कुछ बताए हुए’’।अब मुझे समझ आ गय़ा कि दादी कहना क्या चाहती है। जिंदगी का आखिरी पडाव वह होता
है जब जिंदगी में स्थिरता आती है,कुछ करने
को कुछ सोचने को कुछ नहीं होता ,उसी को वृद्धावस्था कहते है।और जैसा की दादी कहती है स्थिरता मतलब अब कोई लक्ष्य नही रहा ,क्यों कि
उसे करने की नाही तो शारीरिक ताकत रहती है ना ही मानसिक उर्जा ।
इन शब्दों की बहुत गहराई से समीक्षा कर रहा हूँ , पुरी तरह निष्कर्ष तो नही
निकाल पाया हूँ ,पर हाँ दादी की ये बातें कहीं जगह सटीक बैठती पाई है मैने। दादी यह
सब बताने के बाद सो गई और मैं भी एक गहरी सोच लिए वहाँ से चल पडा।
Subscribe to:
Comments (Atom)
Relationship is more to be actioned rather than just talks.
वडोदरा से मुंबई की यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात एक बुजुर्ग व्यक्ति हिरणभा परमार से हुई। वह अकेले सफर कर रहे थे। उन्होंने मुझसे अपने फोन में ...
-
वडोदरा से मुंबई की यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात एक बुजुर्ग व्यक्ति हिरणभा परमार से हुई। वह अकेले सफर कर रहे थे। उन्होंने मुझसे अपने फोन में ...
-
Accommodating people of different culture ,language ,views, geography ,food are the best ways of practicing humanitarian wisdom ,intellig...
-
बचपन के परिंदो के सपनों के घरोंदे बात उन दिनों की है जब चेतना और चतुर सावन में बरसे पानी से बने रेट की टीलो पर अपने घ...
