वडोदरा से मुंबई की यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात एक बुजुर्ग व्यक्ति हिरणभा परमार से हुई।
वह अकेले सफर कर रहे थे। उन्होंने मुझसे अपने फोन में व्हाट्सऐप चालू करने और फोन चार्ज करने में मदद मांगी, क्योंकि उनके पास सिर्फ चार्जिंग केबल थी। यही छोटी-सी मदद एक लंबी बातचीत में बदल गई।
उन्होंने बताया कि वह 1979 में अमेरिका चले गए थे और पिछले लगभग 50 साल से वहीं रह रहे हैं। उनके दो बेटे न्यूयॉर्क में अच्छी तरह से सेटल हैं। वहां की सर्दियां बहुत कड़ी होती हैं, इसलिए उन्होंने और उनकी पत्नी ने सोचा कि सर्दियों का समय भारत में बिताया जाए। इसी वजह से उन्होंने वडोदरा में एक घर भी खरीदा।
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।
पिछले साल उनकी पत्नी का निधन हो गया। वह दोनों भारत में सिर्फ एक ही सर्दी साथ बिता पाए। इस बार की सर्दी वह अकेले थे।
बातों-बातों में मैंने उनसे उनके परिवार के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि उनके दो भाई सूरत में रहते हैं। मैंने पूछा कि आप उनके साथ क्यों नहीं रहते। कुछ पल के लिए वह चुप हो गए। फिर उन्होंने कहा कि जब से वह विदेश गए, धीरे-धीरे संपर्क खत्म हो गया और रिश्ते आगे नहीं बढ़ पाए।
उस पल मुझे एक गहरी बात समझ आई।
उनके पास सब कुछ था — सफल बेटे, विदेश में जीवन, और पैसा। लेकिन भारत आने पर उनके पास कोई अपना साथ देने वाला नहीं था। पत्नी के जाने के बाद जो खालीपन था, उसे पैसा भी नहीं भर सकता था।
हमारी बातचीत सिर्फ दो घंटे की थी, लेकिन उसने मुझे एक बड़ी सीख दी।
ज़िंदगी में सफलता और पैसे के पीछे भागते-भागते हमें अपने रिश्ते नहीं खोने चाहिए।
क्योंकि आखिर में सबसे कीमती चीज़ वही लोग होते हैं जो हमारे साथ खड़े रहते हैं।
