‘’लोकल क्रिकेट’’
आज आधुनिकता में फंसे पड़े लोग , जीवन की दैनिकता, खासकर ग्रामीण जीवन से परेह
हैं। शहरीकरण का बोलबाला ग्रामीण सभ्यता , उनकी जीवन शैली को कहीं हद तक प्रभावित करने लगा हैं।किसी समय जो खेत खलियान आतिशबाजियों से भरे पडे मिलते थे ,आज वे सूखे के भाँति बंजर , पडे हैं। लोग महत्वकांशी हो गए हैं , जीवन को ‘’स्पर्धा’’ मानकर उसमें अंधाधुन दौड़ रहा मानव
,असमझ -सा प्रतीत होने लगा है।खैर जैसी प्रणाली सामने उभर कर आती हैं, लोग उसके अनुसार स्वयं को बंधित
करके उसमें में जुट जाना ही मुनासीब
समजते है।समय बदल गया
है ’’ चैत्र’’ ,’’बैसाग’’ तो मानो जैसे
लुप्त ही हो गये हो , होली , गर्मी की छुटियों के आगमन का तो मानो को सारा रोमांच ही, विलीन मालूम हो पड़ता है। आधुनिकता से भलीभाँतिं महफूज रहने वाला मेरा बचपन तो
बैसाग में कटने वाली फसल से साफ हुए मैदान और उन मैदान मे, आषाड में खेले जाने वाले लोकल क्रिकेट
के इंतजार में कटा है।हर-रोज गर्मी
का ढलता दिन, जॅहा सूरज अपनी तपती चादर समेटें , पर्वतों की आड लिये लेता
था ,तभी अपने-अपने
घरों से निकलकर हम लोग खाली मैदानों में आ-भिडते
थे। बडे लोग टीम वितर्ण
करते
थे और अगर गिनतीं पुरी ग्यारह की न होती तो , हमें भी शामिल
कर ही लिया जाता
था।अब क्या कहें , जेसे तेसे टीम में शामिल हो तो जाया करते ,पर स्वयं में छीपी प्रतिभा को दरशाने
का मौका
कभी-कभार ही मिलता था। कयोंकि हम जैसे प्रतिभाशाली खिलाडियों का उन दिग्गजों में नाम आता था , जिन्हे ‘’डूबती
टीम’’ की नया को और डूबाने के लिए , आखिरी औवरों में नीचे पयदान में उतारा
जाता था।सीधे मुह बोलू तो खेलना तो दूर की बात ,हमें तरीके से बेट पकडना
, तकात नही आता था। कभी-कभार मेच टीम के अनुकूल न होकर ऐसी स्थति में पहुँच जाता था ,जहा छह गेंदो पर दस रन चाहिए
होते थे, और आखिरी विकेट के तौर
पर ना चाहते हुए भी हमें हंसी का पात्र बनने के लिये झंकजोर दिया जाता था। टीम सहयोगी भी बडे महत्वकांशी हो खडे होते थे। और ऐसी उम्मीद लगा लिया करते थे जिसका न तो कोई विकल्प होता
था ,नाहीं कोई अच्छा परिणाम ,देह था।छह गैंदो में मुश्किल से कोई
गेंद ,वह भी गलती से बेट छू जाती थी, तो मन ऐसा प्रफुलित हो उठता था मानो कोई ‘’गढ’’ जीत लिया हो ।हर डाँट-बाँल निकलने पर 3 गालियाँ औऱ एक अतिप्रभावशाली कमेंट से
नवाजा जाता था जिसकी महक आज भी दिल और दिमाग में तरोताजा बनी पडी है। लोंगो की ‘’किसे पकड ले आए बै’’
जैसी टिप्पणी और वितर्क सुन कर एक बार के लिए तो मन ईष्र्या से भर आता था ,तो
तुरंत उसी समय फैसला कर लिया करते थे ,कि क्रिकेट जैसे भद्दे खेल को तो छूना तकात नहीं है।पर थोडी ही देर बाद,’’विवशता’’ से भरे मन को उभार ले आते थे,और स्वयं
को फिर ला तैयार खडा करते थे, किसी ऐसी परिस्थित से जुजने के लिए।
अब वो समय नहीं रहा, उन मैदानों से कहीं दूर आ गए हैं हम ।फसल आज भी उगती है , कट कर मैदान तैयार हो जाते है , पर धुल आँधीं के अलावा उन मैदानों मे चहल-पहल करने वाला कोई नहीं है।लोगों
ने खेलो के प्रति अपनी धारणाएँ बदल ली है , आधुनिक जीवन शैली को अपना कर वे उन मैदानों को मिलों पीछे छोड़ आये
हैं , आज वैकल्पिक जीवन में ही अपनी समृद्धि मान बैठने वाले लोग अपने बचपन
में खेले ‘’लोकल क्रिकेट’’ के प्रति साहनुधूति प्रकट करने को विवश है, और इसी विवशता के भीतर वो रोमांच भी दब सा गया है। ......
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